बुधवार, 18 सितंबर 2013

कालू बाबा अर्थात कालू कहार

     कहा जाता है कि एक दिन नारद मुनि गुरु की खोज में भगवान् विष्णु के पास गए। भगवान् विष्णु ने कहा कि कल सुबह जिस व्यक्ति से तुम्हारी प्रथम भेंट होगी, वही तुम्हारा गुरु होगा। अगले दिन नारद मुनि को सर्वप्रथम जो व्यक्ति मिला उसे उन्होंने झुककर प्रणाम किया। उस व्यक्ति को उन्होंने "गुरु" कहकर संबोधित भी किया। लेकिन शीघ्र ही नारद ने देखा कि जिस व्यक्ति को मेने गुरु माना है वह व्यक्ति तो धीमर कहार जाति का मछुआरा है। उसके कंधे पर मछली मरने वाला जाल था। इससे प्रतीत हुआ वह मछली मारने का रोजगार करता है। नित्यप्रति का भांति वह मछली मारने जा रहा था। नारद ने उसे गुरु मानने से इनकार कर दिया। इस पर क्रोधित होकर भगवान् विष्णु ने नारद को ८४लाख योनियों में भटकने का श्राप दे दिया। यानी नारद को ८४ लाख जीव जंतुओं में बार -बार जन्म लेना पड़ेगा। तभी स्वर्ग में वापसी होगी। विष्णु के श्राप से नारद जी चिंतित हो गए तथा भगवान् से छ्मा मांगी और श्राप मुक्ति का उपाय पूछा। तब भगवान् विष्णु ने कहा कि इसका उपाय तुम्हे , तुम्हारा गुरु ही बता सकता है।

   कहते हैं नारद जी उसी समय धीमर कहार की कुटिया पर पहुचें और पूर्ण वर्तांत बताया। उन्होंने कहा कि गुरूवर मुझे ८४ लाख योनियों में भटकने से बचने का उपाय बताओ। तब उस धीमर कहार ने कहा कि आप भगवान विष्णु की शरण में जाओ और उन्हें जमीन पर ८४ लाख योनियाँ बनाने को कहो। वैसा ही हुआ। विष्णु ने जैसे ही जमीन पर ८४ लाख कीड़े -मकोड़े आदि के चित्र बनाने शुरू किये , नारद ने सरधा पूर्वक उनका चक्कर लगाया और मुक्ति पाई। उसके पश्चात धीमर कहार के पास आकर उन्होंने प्रार्थना कि वह उन्हें माफ़ कर दे। आज से वही उनके गुरु हैं। जानते हो यह धीमर कहार कौन थे ? यही थे हमारे अराध्य कालू बाबा अर्थात कालू कहार।
  

A. C. कर्नर के अनुसार पूर्वांचल के लोग कालू कहार को उनके श्याम वर्ण के कारण उन्हें शनि देव का अवतार भी मानते हैं। कुछ अन्य धरम विशेस्गों का मत हैं है कि कालू कहार विष्णु का ही अवतार थे जिन्होंने नारद की परीक्षा लेने के लिए यह स्वांग रचा था। एक अमेरिकन महिला सी ब्राउन ने ८० के दशक में तुरैहा जाति के शोध के दौरान पाया कि कालू कहार ही मछुआ जाति के अराध्य देव हैं।
    आज भी जब पानी में जहाज अथवा नाव उतारी जाती है तो सर्वप्रथम कालू कहार अर्थात कालू बाबा की ही पूजा अर्चना होती है। मुसलमान मछुआरे कालू बाबा को कालू पीर के रूप में मानते हैं।

     जय कालू बाबा !

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